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Ans: Mirchi me jad galan ek fafundi (fungus) janit rog hai. Isme paudhe ki jaden sadne lagti hain aur unka rang bhura ya kala pad jata hai. Jad kharab hone ki wajah se paudha zameen se pani aur poshak tatva nahi le pata, jisse hara-bhara paudha achanak murjha kar sukh jata hai. Is bimari se khet me paudhon ki sankhya teji se girti hai aur paidaawar me bhari nuksan hota hai.

Ans: మిరపలో వేరు కుళ్లు అనేది నేల ద్వారా వ్యాపించే శిలీంధ్రం (Fungus) వల్ల వచ్చే తెగులు. ఈ తెగులు సోకినప్పుడు మొక్క వేర్లు కుళ్లిపోయి గోధుమ లేదా నల్ల రంగులోకి మారుతాయి. వేర్లు దెబ్బతినడం వల్ల మొక్క భూమి నుండి నీరు, పోషకాలను తీసుకోలేక, పచ్చగా ఉన్న మొక్క అకస్మాత్తుగా వడలిపోయి ఎండిపోతుంది. దీనివల్ల పొలంలో మొక్కల సంఖ్య తగ్గిపోయి రైతుకు తీవ్ర ఆర్థిక నష్టం వాటిల్లుతుంది.

Ans: Root rot in chilies is a devastating soil-borne fungal disease characterized by the decay and blackening of the root system. Because the rotting roots can no longer absorb water and essential nutrients from the soil, the otherwise healthy and green plant suddenly wilts and dies. This disease leads to a severe reduction in the plant population within the field, causing massive yield and financial losses.

उपाय:

  • खेत में उचित जल निकासी (Drainage) की व्यवस्था करें। जलभराव जड़ गलन का सबसे बड़ा कारण है।

  • मिर्च की रोपाई हमेशा जमीन से उठी हुई क्यारियों (Raised Beds) पर करें, ताकि जड़ों के पास पानी न रुके।

  • बीज बोने से पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा विरिडी (Trichoderma viride) 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित (Seed Treatment) जरूर करें।

  • फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाएं। लगातार एक ही खेत में मिर्च, टमाटर या बैंगन की खेती न करें।

  • खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा विरिडी को 50 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर खेत में बिखेर दें।

जड़ गलन की रोकथाम के लिए दवा का छिड़काव करने के बजाय, दवा को सीधे जड़ों में डालना (Drenching) आवश्यक है।

  • दवाई का नाम: रोको (Roko)

  • रासायनिक नाम: थियोफेनेट मिथाइल 70% WP (Thiophanate Methyl 70% WP)

  • डोज: 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर पौधे की जड़ों में ड्रेन्चिंग करें (प्रत्येक पौधे की जड़ में 100-150 मिलीलीटर घोल डालें)।

(वैकल्पिक दवा: यदि फंगस का प्रकोप बहुत तेज है, तो आप ‘रिडोमिल गोल्ड’ – जिसका रासायनिक नाम मेटलैक्सिल 4% + मैनकोजेब 64% WP है, का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से जड़ों में भराव कर सकते हैं।)

मिर्च की खेती में जड़ गलन (Root Rot) रोग: कारण, पहचान और संपूर्ण वैज्ञानिक प्रबंधन

मिर्च (Chili) भारत की प्रमुख व्यावसायिक और मसाला फसल है। किसान मिर्च की खेती में उन्नत बीज, खाद और कीटनाशकों पर भारी खर्च करते हैं। लेकिन कई बार एक स्वस्थ और हरी-भरी खड़ी फसल अचानक मुरझाने लगती है और कुछ ही दिनों में पूरा पौधा सूख कर नष्ट हो जाता है। किसान इसे अक्सर पानी की कमी या साधारण मुरझान समझ लेते हैं, लेकिन इसके पीछे का असली कारण 'जड़ गलन' (Root Rot) नामक भयंकर बीमारी होती है। यह रोग मिट्टी के अंदर पनपता है और सीधे पौधे की जड़ों को खत्म कर देता है। एक सफल मिर्च उत्पादक बनने के लिए इस रोग के वैज्ञानिक कारणों, इसके लक्षणों और इसके संपूर्ण एकीकृत प्रबंधन (Integrated Management) को समझना बेहद आवश्यक है।

जड़ गलन (Root Rot) रोग क्या है?

जड़ गलन एक मृदा जनित (Soil-borne) रोग है जो मुख्य रूप से हानिकारक फफूंद (Fungus) के कारण होता है। मिर्च की फसल में यह रोग मुख्य रूप से फाइटोफ्थोरा (Phytophthora capsici), राइजोक्टोनिया (Rhizoctonia solani), पिथियम (Pythium spp.), या मैक्रोफोमिना (Macrophomina phaseolina) नामक फंगस के कारण होता है।

ये फंगस मिट्टी में सुप्त अवस्था (Dormant state) में पड़े रहते हैं। जब खेत में अधिक नमी और अनुकूल तापमान मिलता है, तो ये सक्रिय होकर पौधे की जड़ों और तने के निचले हिस्से (कॉलर रीजन) पर हमला कर देते हैं। जड़ें पौधे का 'मुंह' होती हैं; जब जड़ें ही सड़ जाती हैं, तो पौधा पानी और भोजन ग्रहण नहीं कर पाता और भूख-प्यास से मर जाता है।

रोग की सटीक पहचान और मुख्य लक्षण (Symptoms)

जड़ गलन की पहचान केवल पत्तियों को देखकर नहीं की जा सकती। इसके लिए खेत का बारीकी से निरीक्षण करना पड़ता है:

  • अचानक मुरझाना: सबसे स्पष्ट लक्षण यह है कि एकदम हरा-भरा पौधा (जिसमें फूल या फल भी लगे हो सकते हैं) अचानक मुरझा कर लटक जाता है।

  • जड़ों का सड़ना और काला पड़ना: यदि आप इस मुरझाए हुए पौधे को जमीन से उखाड़ेंगे, तो वह बहुत आसानी से उखड़ जाएगा (क्योंकि उसकी पकड़ कमजोर हो चुकी होती है)। जड़ों को धोने पर आप देखेंगे कि मुख्य जड़ और सहायक जड़ें गलकर भूरी या काली पड़ चुकी हैं और उनमें से सड़ांध आ रही है।

  • तने का गलना (Collar Rot): मिट्टी की सतह से जुड़े हुए तने का हिस्सा (Collar region) सिकुड़ जाता है, काला पड़ जाता है और वहां की छाल आसानी से निकलने लगती है।

  • पत्तियों का पीलापन: जड़ों के काम न करने के कारण पौधे को नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्व नहीं मिल पाते, जिससे निचली पत्तियां पीली पड़कर झड़ने लगती हैं।

रोग फैलने के कारण और अनुकूल परिस्थितियां

यह बीमारी हवा से नहीं बल्कि मिट्टी और पानी से फैलती है। इसके बेकाबू होने के पीछे निम्नलिखित कारण जिम्मेदार हैं:

  • खेत में जलभराव (Waterlogging): यह जड़ गलन का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है। जब खेत में पानी भरा रहता है, तो मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जड़ें सांस नहीं ले पातीं और सड़ने लगती हैं, जिससे फंगस को हमला करने का सीधा रास्ता मिल जाता है।

  • अत्यधिक सिंचाई: कई किसान जरूरत से ज्यादा सिंचाई करते हैं या खुली सिंचाई (Flood Irrigation) करते हैं, जिससे मिट्टी में फंगस के बीजाणु (Spores) एक पौधे से दूसरे पौधे तक पानी के जरिए तैरकर पहुंच जाते हैं।

  • संक्रमित नर्सरी: यदि नर्सरी की मिट्टी में फंगस मौजूद है, तो रोपाई के साथ ही यह बीमारी मुख्य खेत में भी पहुंच जाती है।

  • तापमान और नमी: 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान और मिट्टी में अत्यधिक नमी इस फंगस के पनपने के लिए सबसे आदर्श स्थिति है।

एकीकृत रोग प्रबंधन (Integrated Disease Management - IDM)

जड़ गलन एक बार पौधे में लग जाए, तो उस पौधे को बचाना लगभग असंभव है। इसका इलाज केवल 'बचाव' (Prevention) में ही छिपा है। इसके लिए बुवाई से लेकर कटाई तक एक संपूर्ण रणनीति अपनानी पड़ती है:

1. कृषि और सस्य वैज्ञानिक प्रबंधन (Cultural Control)

  • उठी हुई क्यारियां (Raised Beds): मिर्च की खेती कभी भी समतल खेत में नहीं करनी चाहिए। रोपाई हमेशा जमीन से 6 से 8 इंच ऊंची उठी हुई क्यारियों पर करें। इससे सिंचाई या बारिश का अतिरिक्त पानी जड़ों के पास नहीं रुकता और नालियों से बाहर निकल जाता है।

  • सॉइल सोलराइजेशन (मृदा सौर्यीकरण): गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करके उसे एक पारदर्शी पॉलीथीन से 3-4 सप्ताह के लिए ढक दें। सूरज की तेज गर्मी से मिट्टी के अंदर छिपे फंगस और उनके अंडे प्राकृतिक रूप से जलकर नष्ट हो जाते हैं।

  • उचित फसल चक्र: जिस खेत में जड़ गलन की समस्या आई हो, वहां अगले 2-3 साल तक मिर्च, टमाटर या आलू की खेती न करें। इसकी जगह मक्का, ज्वार या गेंदे की फसल लें।

2. जैविक मृदा प्रबंधन (Biological Control) आधुनिक खेती में रसायनों से ज्यादा जैविक फफूंदनाशक कारगर सिद्ध हुए हैं, क्योंकि ये मिट्टी को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं।

  • ट्राइकोडर्मा विरिडी (Trichoderma viride): यह एक 'मित्र फंगस' है जो मिट्टी में मौजूद 'शत्रु फंगस' (जैसे राइजोक्टोनिया, पिथियम) को ढूंढकर खा जाती है। खेत की तैयारी के समय 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा और 2.5 किलो स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस (Pseudomonas fluorescens) को 50-100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाएं। इसे एक सप्ताह तक छाया में रखें ताकि मित्र फंगस की संख्या बढ़ जाए, और फिर इसे एक एकड़ खेत में बिखेर दें।

  • बीज और जड़ उपचार: बुवाई से पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा (10 ग्राम/किलो बीज) से उपचारित करें। नर्सरी से पौधे निकालने के बाद उनकी जड़ों को स्यूडोमोनास के घोल (10 ग्राम/लीटर पानी) में 20 मिनट तक डुबाकर रखें और फिर मुख्य खेत में रोपाई करें।

3. रासायनिक रोग प्रबंधन (Chemical Control) खड़ी फसल में यदि 1-2 पौधे मुरझाते हुए दिखें, तो उन्हें तुरंत जड़ सहित उखाड़कर खेत से बहुत दूर जला दें या गाड़ दें। इसके बाद बाकी खेत को बचाने के लिए फफूंदनाशक दवाइयों की ड्रेन्चिंग (जड़ों में भराव) करें। ध्यान रहे, इस बीमारी में पत्तों पर स्प्रे करने से कोई फायदा नहीं होता।

  • थियोफेनेट मिथाइल 70% WP (रोको): 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर हर पौधे की जड़ के पास 100-150 मिलीलीटर ड्रेन्चिंग करें।

  • मेटलैक्सिल 4% + मैनकोजेब 64% WP (रिडोमिल गोल्ड): 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर जड़ों में दें।

  • कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP (ब्लाइटॉक्स): 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से जड़ों में भराव करें। (यदि बैक्टीरियल संक्रमण का भी शक हो, तो इसके साथ 1 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट प्रति लीटर मिला लें)।

  • फॉसेटाइल-अल 80% WP (एलियट): 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी। यह सिस्टेमिक फफूंदनाशक है जो पौधे की जड़ों में जाकर फाइटोफ्थोरा फंगस को नष्ट करता है।

निष्कर्ष मिर्च की फसल में जड़ गलन कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज रातों-रात किया जा सके। इसके लिए खेत की मिट्टी का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है। जल निकासी की उचित व्यवस्था, उठी हुई क्यारियों का उपयोग, और ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक उत्पादों के इस्तेमाल से इस बीमारी को हमेशा के लिए खेत से दूर रखा जा सकता है। एक सतर्क किसान जो शुरुआत से ही अपनी मिट्टी और जड़ों का ख्याल रखता है, वही अंततः मिर्च की एक बंपर और रोगमुक्त पैदावार हासिल कर सकता है।

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